शुक्रवार, 23 मार्च 2012

अथ श्री गण(तन्त्र) नायकै नमः

(भोलेनाथ की इस सारी लीला से स्पष्ट संकेत मिलते है कि गणराज्यों और उनकी संप्रभुता के रक्षक गणाधिपति की अवधारणा सर्व प्रथम महादेव द्वारा ही प्रतिपादित हुई थी।)
  
हे... गणनायके, हे.....गणधिपत्यै आपकी जय हो। आप जानते है कि प्रति वर्ष हम सभी लोग उत्सव मना मना कर आपकी पूजा अर्चना, आरती वन्दन, कंकुम और चन्दन से करते है। मौसम की मांग हो तो केसर कस्तूरी का टीका भी लगाते है। श्रद्धा पूर्वक भोग भी लगाते है। ज्यों ज्यों महंगाई बढ रही है, भोग लगाने और चढावा चढाने की हमारी हैसियत भी बढती जा रही है। अब तो एक एक लड्डू 250 किलो का चढाया जा रहा है जिसे देख कर आप दांतों तले अंगुली दबा देते होंगे। यह करिश्मा दिखाने का सारा श्रेय हमारे वर्तमान गणनायकों को है, जिन्हें हम आपके रूप में चुन कर भेजते है। सभी अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद, हे गणाधिपत्यै, हम लोग भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की प्रत्येक चतुर्थी को आपके जन्म दिन के रूप में मनाते आ रहे है।

सर्व देवों में प्रथम पूजनीय हे गणपति जी, आपकी कथा के पाठ से हमारे क्षुद्र ज्ञान ने जो तथ्य प्राप्त किये है, अपनी दुर्बुद्धि से हमने उनका विवेचन किया तो कुछ विस्मय बोधक नतीजों ने हमें रोमांचित कर दिया। इससे आप में हमारी आस्था और भी दृढ हुई। हमें अपनी संस्कृति और उसके आध्यात्मिक साहित्य ने अपने समय की सामाजिक व्यवस्था में आये तत्कालीन परिवर्तन का जो आंखों देखा हाल हमारे सामने रखा है, उसको पढ-सुन कर हमें अपने अतीत पर गौरव अनुभव हो रहा है। उसके स्मरण मात्र से ही हमारा मन मयूर नाच उठता है। आपकी प्रेरणा से ही उन्हें क्रमबद्ध करने की अदम्य इच्छावश निम्न तथ्य पेश है।

1.शास्त्रों द्वारा प्राप्त जानकारी से विदित होता है कि अपने श्वसुर प्रजापति दक्ष के यज्ञ का विध्वंस और संहार आपके पिता महादेव जी के गणों ने किया था। इसमें सोचने वाली बात यह है कि शिवजी के गणों को कहीं भी शिव सैनिक सम्बोधित नहीं किया गया है। प्रत्येक स्थान पर उन्हें शिवजी के गणों के रूप में ही सम्बोधित किया गया है।

2.आप अपने माता पिता की जैविक सन्तान नहीं थे। आपने माता के गर्भ से जन्म नहीं लिया था। शास्त्र कहते है कि आप अपने माता पिता के मानस पुत्र थे, और अपने गणराज्य में गणेशा यानि कि अपने गणों के ईश्वर के रूप में पहचाने जाते थे। एक लम्बे समय तक आप अपने पिता से नहीं मिले थे। आप मातृभक्त थे और आपको अपनी अपार शक्ति और सामर्थ्य पर नाज था। मातृप्रदान शक्ति पर आपको गर्व था जिसकी सामर्थ्य कें भरोसे आपने अपने पिता से युद्ध किया। इस अवसर पर अपने पिता से हुए सम्वादों से आपकी उद्दंडता का आभास होता है। आपके उस समय के व्यवहार से लगता है कि उस समय तक आप अपने पिता से तो अपरिचित थे ही, वरंच अपने उन गणों के सुख दुख से भी अपरिचित थे जो कि आपको ईश्वर के रूप में मानते थे। तब तक आपका अपने गणों (जनता जनार्दन ) से सम्पर्क और समझ भावना का रिश्ता नहीं जुड़ पाया था।

3.पुत्र गणेश और पिता महादेव का संघर्ष यह स्थापित करने के लिये पर्याप्त है कि गणतन्त्र में वास्तविक सत्ता का केन्द्र व्यक्ति की अपनी ताकत में नहीं, जनता (गणों) द्वारा नेता पर किये गये विश्वास के बल में होता है। पिता ओर पुत्र के इस वैचारिक संघर्ष  में  पिता लोकतन्त्र की अवधारणा के बीज मन्त्र शिव  की विजय होती है, जो कि गणों के शासन को वरीयता देते थे। ऐसा लगता है कि कैलाशपति महादेव ने कोई राज्य स्थापित नहीं किया था और कि समस्त सृष्टि ही उनकी प्रजा मानी जाती थी।

4.उक्त वर्णित संघर्ष की परिणिति में आपके सिर चढी अहमन्यता का शिरोच्छेदन करके उस जगह पर हाथी का विवकेशील सिर लगाया गया। माना जा सकता है कि यह संघर्ष आपमें विवके जगाने का अनुष्ठान था जिसके बाद में आपको समस्त देवताओं से अधिक विवकेशील होने की मान्यता प्राप्त हुई जिससे सभी देवताओं से पहले अधिकारिक रूप से आपकी पूजा अर्चना करने का प्रावधान प्रारम्भ हुआ। 

5.भोलेनाथ की इस सारी लीला से स्पष्ट संकेत मिलते है कि गणराज्यों और उनकी संप्रभुता के रक्षक गणाधिपति की अवधारणा सर्व प्रथम महादेव द्वारा ही प्रतिपादित हुई थी। इस व्यवस्था को पुष्ट और सम्पूर्णता प्रदान करने के लिये सभी देवताओं द्वारा सर्व प्रथम पूजनीय एक ऐसे देवता को स्वीकार्यता दिलवाई गई जिसमें सभी गणों की सामर्थ्य और ताकत निहित हो एवम् जिसके इर्द गिर्द रिद्धि और सिद्धि विराजमान रहती हो।
हमारा मानना है कि भाद्रपद की शुक्ल चतुर्थी ही वह शुभ अवसर रहा होगा जब विश्व में गणराज्यों की संस्कृति को स्वीकार्यता प्राप्त हुई और जिसे आज भी परम्परागत रूप से मनाया जा रहा है। हम आज भी आपकी इस प्राच्य युगीन परम्परा के साक्षी है। आप बुद्धि के देवता माने जाते है और हम बूद्धिजीवी। इस प्रकार आप को इष्टदेव मानते हुए अपने युग के गणतन्त्र के संवाहकों, संचालकों से हमारा निवेदन है कि गणतन्त्र और गणनायकों के वर्तमान भवनों में प्राचीन तम गणनायक के रूप में आपके चित्र लगाये जाएं। हमारा मत तो यह भी है कि विश्व-लाकेतन्त्र के सभी महान आवासों में आपकी तस्वीर सुशोभित हो।  

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 लेखक - कन्हैयालाल  जोशी  " वक्र "